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"वैराग्य याने उन चीजोंका त्याग करना, जहाँ आपकी इच्छाशक्ति व्यर्थ जाती है। फिजूल इच्छाओं का त्याग ही वैराग्य है। जब तक पूर्ण इच्छाशक्ति नही होगी, एकाग्रता नही आयेगी। जो एकाग्र चित्त होता है, वही सिद्धि प्राप्त करता है। और बातों में कैसे मन जुट जाता है? क्यों कि वहाँ हमारी इच्छा है। दोष आप का ही है। करने वाले को सब संभव है। जब लगन लगेगी तो अंतरिक इच्छा खुलेगी। अभ्यास करते रहो, लाभ मिलेगा एक ना एक दिन।"

- स्वामी अमर ज्योति

"वह ज्ञान जिसका आधार आत्मा है वह अध्यात्म कहलाता है। आत्मा को अपनी चेतना में लाना अध्यात्म है। अपनी वृत्ती ऊर्ध्वमुखीन करने के लिए (ऊपर उठाने के लिए) अध्यात्म है। अध्यात्म ज्ञान बहस की बात नहीं अभ्यास की बात है, जिससे अंदर की जागृति आये। ज्ञान पाने के लिए आपकी इच्छा ही सबसे महान शक्ति है। जब तक आप द्वार नही खोलेंगे, प्रकाश अंदर नही आयेगा। प्रभुने सब कुछ दिया है, कमियाँ अगर हैं वह आपमें हैं। अगर आपकी प्रबल इच्छा हो, तो प्रभु सहायता जरूर करेगा।"

- स्वामी अमर ज्योति

"बिना प्रभु चरणों के शांति नही मिलेगी। संसार में जो भी थोड़ा बहुत स्वाद आता है, वह अंदर से ही आता है, क्यों कि परमात्मा आपके अंदर है। बकरी जब कांटे चबाती है, उसे लगता है कि स्वाद उन काँटों को चबाने से आ रहा है। उसे यह नही मालूम, कि स्वाद, असल में, उसके अपने खून से आ रहा है। इसलिए मन वहाँ लगाओ जहाँ से आनंद आ रहा है। फिर संसार की कोई चीज़ आपको परेशान नही करेगी।"

- स्वामी अमर ज्योति

"त्याग याने उसे छोड़ना, जो आपके मन को अटकाता है, कमजोर या चंचल करता है, जिसके कारण आपका प्रभु से वियोग होता है। त्याग शब्द से डरो मत। त्याग सिर्फ बैरागियों के लिए नही, संसारियों के लिए भी है। संसारियों के लिए अंदर का त्याग है, जिससे आप शांति और आनंद पायेंगे, भगवान से मीलन होने का मार्ग खुलेगा। जैसे की, संबंधियों को मत छोड़ो, पर संबंध छोड़ो। यह अंतरिक त्याग है। "

- स्वामी अमर ज्योति

"परमात्मा पूर्ण स्वरूप है, इसलिए वह हमसे शरणागती भी पूर्ण रूप से चाहता है। अगर सच्ची याचना हो, मनमें नम्रता हो और अहेतुक शरणागती हो, तो परमात्मा आपसे दूर नही। जब दुर्योधन और अर्जुन श्रीकृष्ण भगवान के पास मदद मांगने पहुंचे, अर्जुन ने भगवान को ही मांग लिया, यद्यपि वह अकेले थे और युद्ध भी नही करनेवाले थे। यह है अहेतुक शरणगती।"

- स्वामी अमर ज्योति

"जब सही सोच आरंभ होती है, तब मनकी शांति शुरू होती है। आपके भाग्य में आया हुआ कष्ट, जागृती का साधन मानो। जो भी पारिस्थिती आये, उसके लिए खुद को जिम्मेदार मानो। जितना प्रतिकार करोगे, दुख बढ़ेगा, अशान्ति बढ़ेगी। भगवान ने जो कुछ भेजा है मेरे कल्याण के लिए है, यह अटूट श्रद्धा ही भक्ति है।"

- स्वामी अमर ज्योति

"मनको उसकी लालसा नही देना यही तपस्या है। जैसे कि असत्यवादी को सत्य बोलना। तपस्या से पवित्रता आती है।"

- स्वामी अमर ज्योति

"Come back to your Home your Source your True Being where you are aware, conscious and relaxed. That is the solution."

- Swami Amar Jyoti

"With a pure heart pray to God, “Let me be awakened. Make me conscious as Thou art. “"

- Swami Amar Jyoti